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Wednesday, 20 May 2015

हाँ माँ,तुमने ही तो सिखाया था...

हाँ माँ,तुमने ही तो सिखाया था,
पहले पहल की कैसे,
होता है चलना ये पैदल I

हाँ माँ,तुमने ही तो सिखाया था,
पहले पहल की कैसे,
गिरना हीं बनाता है,
कहीं पहुँचने को सफल I

हाँ माँ,तुमने हीं तो सिखाया था,
पहले पहल की कैसे,
धरती भी होती है माँ,
और कैसे चंदा है चंदा मामा I

हाँ माँ,तुमने हीं तो सिखाया था,
पहले पहल की कैसे,
कोरे कागज पे लकीरें,  
लेती हैं सांसें और बनाती हैं,
तकदीरें जो हो अटल I

हाँ माँ,तुमने हीं तो सिखाया था,
पहले पहल की कैसे,
सपनों  में होती है ताक़त,
की कैसे  आफत भी देते हैं हिम्मत I

हाँ माँ,तुमने हीं तो सिखाया था,
पहले पहल की कैसे,
बनना हैं रण का अर्जुन,
की कैसे करना हैं मोहन का सृजन ,
की हंसना हैं जैसे हंसा था  वो गौतम ,
की हराना हैं जैसे हारा था वो रावण I

रचना : प्रशांत



4 comments:

  1. They teach us everything - from walking to talking, and how to be a good human being. Beautiful poem.

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  2. Thanks Saru for your visit and comment.

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  3. Prashant, Excellent poem. It seems , My Mom is the same version of your Mom.

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  4. Thanks Sujata for your wonderful comment.

    Perhaps all mothers of the world have the same software inbuilt in them.

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