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Saturday, 30 May 2015

जब देखा आपकी तस्वीर को...

जब देखा आपकी तस्वीर को,  
तो  भूल गए हम अपनी तक़दीर को I 
उमर ने तराशा आपको अपनी नज़र की बेक़रारी में,
और आपकी ख्वाइश लिए आँखों में 
रात काटी हमने गज़र के ग़मख़्वारी में I 

एक अज़ीब सी कश्मकश हर वक़्त रहती है, 
के कह दें आपको  की हाँ आपमें में हीं  मेरी जान बसती है,
पर  लगता है डर की कही आप  ऐ न कह दें की 
आपकी  दुनिया कहीं और बसती है I  

रचना : प्रशांत 

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