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Tuesday, 2 June 2015

शरीक हो, ये समझ इशारों मे थी...

शरीक हो, ये समझ इशारों मे थी ,
क्या बताए कैसे बताए ,
ये मुहब्बत  हमने कैसे निभाई,
कहानी कुछ और, बताई शीशे ने,
भाग आए फिर कश्ती  सजाने I

देखा तो महफ़िल कुछ बदला सा मिला,
नये आशिकों  से घिरा हुआ सा मिला,
लगा हम बहुत कुछ बदल से गये हैं,
ऊम्र को ताबीज़ की ज़रूरत आ गयी है I

तलाश उन्हे किसी गुमशुदा  का हो,
जो गुम हो, पर वजूद सितरो मे हो,
जिन्हे देख, उनकी सितारे चमकती रहे,
रोशनी ना दिखे, लेकिन नाम जूडी रहे I

उमीद लिए और सताए, यह हो ना सका,
खुदको दे बदल, दुनिया से बदल, हो ना सका ,
उठ के फिर चले, रूठ कर फिर जले,
टूट कर फिर चले, जल कर फिर चले,
फिर दूर जा चले, हस हस फिर चले I

रचना : प्रशांत 

1 comment:

  1. तलाश उन्हे किसी गुमशुदा का हो,
    जो गुम हो, पर वजूद सितरो मे हो,
    जिन्हे देख, उनकी सितारे चमकती रहे,
    रोशनी ना दिखे, लेकिन नाम जूडी रहे I
    खूबसूरत पंक्तियाँ

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