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Thursday, 28 January 2016

फिर वोही बात -II





क्या कहें के हम आज फिर,
गुम हुए खुद से,
निभाए रिश्ता कितने भी इन गलियों से ,
फिर गुम हुए इनसे I

कुछ आज़ादी इतनी सी, अगर मिल जाती,
जी लेते हम भी एक अपनी पहचान
ना होता एहसास नकामी नासमझकी,
ना होता परछाई  बेवस, कायासे अंजान I

ना हुए कल के, अब हम
ना जुड़ पाए किसी आज से
आदेश हो यारो यह भी केह दे ,
या ना कभी यह भी कह पाये,
एक हसीन वक़्त की सज़ा,
काटे, गुम हुए इनसे,
वोही वक़्त की तलाश मे,
फिर गुम हुए खुद से I




रचना :प्रशांत

2 comments:

  1. कुछ आज़ादी इतनी सी, अगर मिल जाती,
    जी लेते हम भी एक अपनी पहचान
    ना होता एहसास नकामी नासमझकी,
    ना होता परछाई बेवस, कायासे अंजान I
    सुन्दर काव्य !!

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  2. धन्यवाद योगी सारस्वत जी !

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