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Saturday, 28 March 2015

ज़ाम मे थी कुछ तो कशिश...


चित्र साभार : http://www.texaswineandtrail.com/women-influence-wine-trends/


ज़ाम मे थी कुछ तो कशिश,
पल हो गायब, होश से सजे बारीश,
नज़र झुकाए हुए,
नम थी पलकें , हंसी सजाए हुए,
शुरू  हो बात , जाने- ज़ाम लगाए हुए, 
रियासत नयी बनाए हुए I 

दिल की बाते , लापता धड़कन तेज हुए, 
मौसीक़ी  की लहरें, झलकाए महफ़िल,
खुद को आज़ाद पाते हुए I 

दीवाना फिर सबको कर दे,
जाने-जामपे जान और थी बाकी,
साक़ी हो शौक  इसी शौक़ीन के लिए,
ऐसे ना सोच, चोट खाए हुए , 
समय की बात ,समय के बाद ,  
आज हम खुलके जीए I

रचना :प्रशांत 

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