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Sunday, 8 March 2015

फिर एक बार दिल तो चाहे के...


चित्र साभार : http://pixabay.com/en/snowball-fight-snow-winter-young-578445/


फिर एक बार दिल तो  चाहे के,
खंजर चुभे, और दिल की प्यास बुझे ,  
इल्तिज़ा बस  इतनी ही है हमारी के  , 
फिर से दिल को  लगे 
दवा मुहब्बत की ज़हर I

चोट खाए अगर अपनी हीं करम से, 
तो भाई खूब है, मंज़ूर भी वोही,
फिर एक मौत, जी भी लेंगे ,
मुहब्बत ईक और बार तो सही I

भले ख़ुशी हो, या हो ग़मों  की ख़ुशी,  
आज़ाद  गिरने की डरसे खुशी ,
जिंदा हूँ , यह एहसास कम तो नही,  
मरता भी हूँ , यह भी कम तो नही I 

अपना लिया, यह कुछ कम तो नही , 
पल जो जी लिया, यह भी कुछ कम तो नही I

रचना : प्रशांत 

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