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Monday, 17 November 2014

एक शाम गुज़रती नहीं...

एक शाम गुज़रती नहीं, 
एक साल  गायब हो जाती है I 
तेरे इंतज़ार में ऐ सनम, 
उमर बिन गिने  हीं बीत जाती है I 

मेहबूबा हज़ारों हमने देखे, 
पर न ज़ुल्फ़ बदल बने, 
न आँखे काजल बने ,
न खूशबू हीं रूह में झलके I 

उस रात के राख की रेत मुट्ठी में है ,
मुहब्बत के अंगार आँखों में,
पर तुम्हारा नशा मेरी साँसों में आज भी ज़िंदा है
ऐसे जैसे धड़कता है दिल सीने में I

रचना: प्रशांत 

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