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Thursday, 18 December 2014

बाज़ार!

मन फिर मनसे अलग होने लगा,
अपनो में बेगाना बन ने लगा,
इसे रोक पाना फिर हो मुश्किल ,   
इसके हो जाना, और भी मुश्किल I 

क्या कुछ  तलाशना आज भी बाकी,
यह खबर है, खबर और बे-खबर,
तूफान हो क़बूल अगर हो बहार,
बे-खबर फिर हो खबर,
फिर बने खबर तो क्या खबर I 

बिक गये कीमत लगने पर,
नीलाम सारे आम होने पर,
बाज़ार के हम हो ना पाए,
कीमत अदा वो कर ना पाए I 

फिर शुरू हो जाए वो सिलसिले,
कुछ  डर और कुछ शिकवे गीले,
उम्मीद,फिर ना-उमीद के मेले,
घुँगरू पहेने यह तवायफ़,
फिर उस कोठे को झेले I 

कीमतकी बाज़ार को फिर वो जाए,
कोई और इसकी फिर बोली लगाए,
कोई और खरीदे, और उससे सजाए,
वक़्त कमी से, कभी सज़ा ना पाए,
बोली की बाज़ारसे कहीं डोली उठ जाए,
इसी डरसे वो फिर नयी बाज़ार आजाए I 

रचना: प्रशांत   
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