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Tuesday, 22 December 2015

उस शाम पल खरीदने की हिसाब जुड़ रही थी...

उस शाम पल खरीदने की हिसाब जुड़ रही थी
क्या बताएं की कैसी वो शाम थी,
कुछ ना था अलग पर वो एक अलग शाम थी I

साल बीत गयी, सवाल आज भी था,
वो हसीन पल जो हमे हासिल था,
ख़यालो मे ज़िंदा पर रूबारू ना थाI

जो गवाए यह हिसाब आ रही थी ,
बचपन से  जवानी फिसली जा रही थी ,
पैसे के तमाशा मे पल जुदा जा रही थी,
पल खरीदने की हिसाब जूड रही थी,
पल बेमिसाल, पैसे बेकार बिकती थी ई

रचना : प्रशांत 

2 comments:

  1. साल बीत गयी, सवाल आज भी था,
    वो हसीन पल जो हमे हासिल था,
    ख़यालो मे ज़िंदा पर रूबारू ना थाI
    गहरे शब्दों में लिखी शानदार रचना ! सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. धन्यवाद योगी सारस्वत जी!

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