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Friday, 24 October 2014

कुछ ख्वाब अधूरे से...



चित्र साभार: गूगल 




कुछ ख्वाब अधूरे से बार बार दिखे,
जो हमनाक़ाब हैं,वो कभी कभार दिखे I 
जो हमें रूह में सजाये हुए हैं,
उनको ये उनकी सौतन ही दिखे I 

ख्वाइशें आज भी अजनबी सी खींचे,
हमजान जो ये मुस्कुरा के कहें की, 
दिलफ़ेंको के शहंशाह हो तुम,
तो लो ये ताज महल हुआ तुम्हारा करो ना गम I 

वरना हम लाखों में एक आज भी हैं,
हम पे मरने वाले ज़िंदा आज भी हैं,
हम कहें सुनो वो मेरी हमनाम,
ये शाम होगी एक अजनबी के नाम I

रचना: प्रशांत पांडा 

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