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Sunday, 26 October 2014

फिर वही बात !




चित्र साभार : www.shutterstock.com 



सियाही और सुराही जो साथ साथ चले ,
ख्वाइशें पर्दों में वाह वाह जो मिले, 
इशारे हमराही न समझ पाएं ,
उनकी नासमझी की  तारीफ़ हम भी करें I

जितने हमराज़ हमारे ,दुसरे आहें भरें,
तमन्ना रहे बाकी, खाली खाली रहे सुराही, 
जैसे रात बिना चाँद, 
हम उस रात की हम क्या बात करें I 

थोड़े से ऐतबार की जो बात करें, 
हमनाज़  भी ऐतराज़ ही करें I 

ख्वाब जो बार बार निखरे इन पैमानों पे वो नाज़ न करें,
की ख़्वाब की ज़िन्दगी पैमानों में मय के थमने भर है I

मुसाफिर अशिआना तलाशने जो चला, 
अपनी महफ़िल को भी टांग काँधे चला I

आँखों के प्यालों में हमें जीने दो,
साथ साकी को भी आप आने दो ,
आज सियाही और सुराही को मिल जाने दो,
आज दिल को जिगर में पिघल जाने दो I

रचना: प्रशांत पांडा 

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