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Tuesday, 28 October 2014

खामोश बानी !

चित्र साभार: www.eso-garden.com

हर चुप्पी के पीछे कोइ बात का होना ज़रूरी तो नहीं
कई सदिय़ा यूँही गुज़र गयीं बिना कुछ कहे, कुछ कहे
तुम ख़ामोशीअों में ढुढंते रहे मेरी अस्तित्व को
मैं ख़ामोश पत्थरीली आगोश में खोती गयी ,खोती गयी।

मुझे याद नहीं कब मेरे लबों की गुन गुनाहट गयी हवा में मिल
और मन की बाँसुरी स्तब्ध सी निश्चल शान्त मोहिनी हो गयी स्थिर
तुम्हें मदहोश न कर पायी मेरी मुस्कराहट की ज़ुबां
रह रह कर बहती गयी अनदेखी आँसुओं का निरझर।

अब पाषाण धरती मेरी कर रही अपेक्षा
तुम फिर सावन बन बरसाओगे मद का नशा
भीगेंगे तन मन नवीनता से रोमान्चित हो
बरसेंगे बादल फिर गायेंगे वन के पपीहा
अहल्या बन जाऊँ मैं किसी महान स्पर्ष पा
अनगिनत सुरों से सथ्मभित हो जाएगा आसमान।

रचना: मीरा पाणिग्रही 
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