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Monday, 5 January 2015

एक कहानी ऐसे भी...

कुछ तो है बात, जो नज़र ना आई,
चाहत के कोई ख्वयीश, दफ़न  जो हुई,
बिन जुबा आई, फिर बुझ जो गयी,
क्या तुझे इल्लम नही, में भी हूँ ज़िंदा,
किसी गली में, एक  लाश भी है, तुझसे जिंदा,
क्या तू कभी मुझे, देख ना पाए, इन खामोशी में,
 क्या तेरी ज़िंदगी आज भी कही , महफ़िल से सजी तो नही?

ना मैं  इल्ज़ाम दिया , ना मैं  भूल सका ,
मरभी ना सका, ना अलग जी ही सका,
तू अगर मुझ को आज़ाद करे, फिर तो आवाज़ दे मिले,
या फिर मेरी आवाज़ बन कर, दफ़न  कहानी से मिले,
ना हिसाब हो मेरी, ज़ख़्मे दिल जुदाई का,
ना हो कोई हिसाब हो , इलतेज़ा मेरे दिल का I 

 रचना: प्रशांत  
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