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Wednesday, 14 January 2015

मेनका मोह बिश्वामित्र सताए...


बादल बरसे रिमझिम रिमझिम,
कोयलिया ये गीत सुनावे,
मन आँगन मे साज़ सजी है,
मन के वीणा झन झन गाये  I 

ताल ये तेरी चाल लगे है ,
मृग नयना गीत सुनावे ,
बाजे पायलिया बात सुनाये ,
मन मोरा आज बहकन जाए I 

तेरी घूँघट मुझे और सताए ,
घुँगरू छम छम प्यास बढ़ाए ,
नैना कजरा मोहे और लुभाए ,
केश ये गहेरा रात बन जाए I 

हे मनमोहिनी चंचला कामिनी ,
दास है  तेरा यह मन बैरागी ,
सारे तपस्या तुझ से ही हारे ,
हारा यह जोगी, दास स्वीकारे I 

ऋषि महर्षि जब हार से जीते ,
मैं मनजोगी मन से ही हरा,
काहे मन हाए समझ ना पाए,
मेनका मोह बिश्वामित्र सताए I 

रचना : प्रशांत 

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