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Friday, 13 February 2015

क्यूँ किसी को ऐतराज़ हो...

क्यूँ किसी को ऐतराज़ हो,
ग़र  तुझे भले ज़ख़्मो हीं से प्यार हो ,
तेरे ज़ख्मों पे तू फिदा हो,
अगर तेरे आँसू से सिंची ,
तेरे कहानी फिर से  जिंदा हो ,
तो क्यूँ किसी को ऐतराज़ हो ? 
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कभी अलग मिलकर तू देख ,
कटी पतंग के डोर छू कर तू देख ,
टूटे शीशे को जोड़कर  तू देख, 
कभी किनारो से दूर डूब कर तू देख,
जो दिखे उसे महसूस कर तू देख I 
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हज़ार चेहेरे तेरे और दिखे ,
ख्वाबो मे जो ना दिखे ,
नज़र मिलाए तुझे दिखे ,
क्या महबूब की चहेरे से 
नक़ाब उठ ना पाए ,
या कोई चेहरा 
तु आज देख ना पाए I 

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रचना : प्रशांत 

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