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Thursday, 19 February 2015

क्यूँ ना एक बार फिर...

क्यूँ ना एक बार फिर ,
प्यार  मिले  मुड़ के ,
हम तो प्यासे हैं,
तर हो जाएंगे, एक बार फिर जुड़ के I

एक सुबह ऐसी हो फिर से ,
जो लगे थोड़ी अलग ,
खुशबु  बिखरे फूलो से ,
मन जाए सुलग,फिर से I

क्यूँ ना एक दिन आए फिर से,
जो किये रहे हमें दिन भर बेचैन,
हर पल बस हम देखें शाम की हीं राह ,
जब हो दीदार उसका तभी मिले हमें चैन I

क्यूँ ना एक शाम आए फिर से ,
जब हम साथ साथ चलें मिल के,
हो हाथों में हाथ उसका
लब रहें खामोश पर दिल बातें करे खुल के I

क्यों न एक रात आये फिर से,
जो सजाये तड़प की बारात फिर से,
पर रखे जो रात के जतन को अपने ही अंदर,
जैसे सीपी सोती हैं गहन समंदर  I

रचना: प्रशांत 

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