Monday, 9 November 2015

ज़िंदा हे तू , ये एहसास कर...

ज़िंदा हे तू , ये एहसास कर ,
कल हो ना हो, खुश हो के आज  बिखर,
पल मे जो बदल दे समा ,
वो दिया है तू, जल जल जी ले ,
पल पल जी ले , जल जल जी ले I 

नौकरशाही  पर नवाब से कम नही, 
सलाम नवाज लो, पर सर नही,
जिंदा हू में और मुझसे तू ज़िंदा, 
ठोकर ना मार तू मुझसे है  ज़िंदा I 

ना डर, ना रह कभी करम से जुदा,
तेरे खुदा तेरे साथ, तेरे करम पे फिदा,
कोई इंसान क्यू बोले वो तेरे खुदा, 
करम तू  कर, रेहम खुदा रेहम खुदा I 

रचना: प्रशांत 

Sunday, 8 November 2015

इतेफ़ाक़ से निकले लव्ज़...



इतेफ़ाक़ से निकले लव्ज़,
दिल के हो करीब, 
इतना नही था पता,
मूड के देखे तो लगा,
लावारिश जो हमसे जुदा निकले, 
मेरी कविता कहलाए, 
भले अंजान यू निकल आए I

रचना : प्रशांत 

Thursday, 5 November 2015

A video program on financial aspects of life!






This is an odia language program conducted by Dr. Prashant Chandra Panda on financial issues.

आज क्यू फिर यह लगे...




आज क्यू फिर यह लगे,
मैं आज़ाद मिलूं  मेरी तन्हाई से, 
के फिर आप आए ना आए 
मैं आज़ाद मिलूं मेरी तन्हाई से I

क्यूँ मानूं  की  मेरा इम्तेहान  बाकी है,
आपकी नज़रों से ,
क्यों ना मैं खामोश चलूँ,
और खुदा से भी दूर चलूँ I

मेरा वो आशियाना है वहाँ,
जो तेरे साये  से है  दूर,
खुदा जहाँ कभी आया करते हैं,
जब वो हो बन्दों से मज़बूर I

रचना: प्रशांत 

जाने क्यू आज ऐसे लगे...



चित्र साभार : http://img00.deviantart.net/4e8a/i/2010/038/0/8/unveiling_the_shadow_world_by_yamaha_neko.png


जाने क्यू आज ऐसे लगे,
मेरे इंतेज़ार की इंतहाँ है, 
जाने कितनी शामें  बित गयीं,
फिर मेरे इंतेहा की इंतेज़ार है I

बात इतनी सी थी,
जो वो नासमझ रूठे हम से, 
इतनी सज़ा दे वो खुदको, 
की हम रूठ चले I

साथ वो अपने निभाते चले,
रिश्तों से आज़ाद रिश्ते निभाते चले, 
खुद वो आग मे जलते रहे,
खामोश आग रूह मे लिए, 
हम राह मे जले और चले  I 

रचना: प्रशांत 

Tuesday, 3 November 2015

एक परदा खामोशी की ओढ़...




चित्र साभार: http://www.springbokhouston.com/events/2014/12/31/new-years-eve-masquerade

एक परदा खामोशी की ओढ़, 
क्यूं चले आते हो बेपर्दा, 
सिसकियाँ  सुन लेता है जमाना, 
आज भी वो दीवानो की दीवाना I 

जग ढूंढे तुम्हे यहाँ वहाँ, 
जाने कहाँ कहाँ  जहाँ तहाँ, 
मुझे जीने दे अंजान, घने बादल मे ,
हमआरज़ू के बाहों मे I 
रिश्ते ना कर तू ज़िंदा,  
तस्वीर की तक़दीर खोज मे I 

रचना : प्रशांत 

Sunday, 1 November 2015

इतनी मुहब्बत नसीब होगी हमें...

इतनी  मुहब्बत नसीब होगी  हमें,
यह ना था पता,
ख़ुशी  के सागारमे गम डूब जाएगा,
यह ना था पता,
शुक्रिया आपको जो मुझे समझे,
आम इंसान को काबिल तो समझे I 

खुदा से हम और क्या मांगें,
बस इतनी दुआ मांगें,
आप को इतनी बरकत हो,
के धरती आपसे हारा भरा हो,
कुछ इसके काम आप आए,
कुछ आप के काम हम आए I 

रचना : प्रशांत  
* यह रचना जन्मदिन के अवसर  में मिली बधाइयों को  समर्पित है I