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Thursday, 9 April 2015

दो ज़ुदा अतीत के दोराहे पे ...

दो  ज़ुदा  अतीत के दोराहे पे फिर आ पहुँचे,
दोनो अपना सा लगे, दोनों सपना सा लगे,
उम्मीद  हमें किसी से भी नही,
तकदीर माथे पे सजाये,
फिर हम आ पहुंचे एक मोड़ पे ,
गुजरने एक दौर से I 

रचना:प्रशांत 

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