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Wednesday, 22 April 2015

समर्पण अब तुमसे...





दूर गगनके, पंछी को देख,
मन बहके और पंख लगाए,
हे भगवन  तेरा आशीश माँगे,
मन उड़े और उड़ते जाए I

इंसान बने, इनसे काहे घबराए ,
तेरी सृष्टि हमे, अप्रम्ब लगे,
ऋतु आए, पर रीत ना आए,
रीत के नीत दिख, ये दिन घबराए,
तेरे रचना हम ना रख पाए,
सृष्टि  विपरीत  सृष्टि रचाए,
देव की काज इस जनम ना होये,
मानव को फिर देवता माने ?

दौड़ ये देख इंसान की कीर्ति,
जनम सीध जनम की रिति,
जनम की राज़ जब हम सीखे ,
इंसान अलग हू, इंसान बताए,
ऐसे में मुझे शरण मे लेले,
चरण शिर हो, इतनी जगह दे ,
मेरे प्राण निछावर हो उन से,
जो दिन दीन, तेरे शरण मे आवे,
इतनी अक्ल  मुझको दे दे I

तेरे जो ख़ुशी, मुझको ख़ुशी दे,
तुम समर्पण सुदामा सम सुख दे,
हे ईश्वर अब कुछ  राह दिखा दे I

रचना : प्रशांत

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