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Thursday, 30 April 2015

अपना देश अपनी सरकार: एक विचार !

शुष्क हो गया तेरा तनमन,
क्यूँ टूटा कंगन , उजड़ा ये आँगन,
क्यूँ माँ , तू खुद को दे सज़ा,
उजड़े  चमन और उजड़े फ़िज़ा I

कोरोड की मा , यह कयनात तेरी
आज़ाद है मा, यह जीवन तेरी
सब की मा तू, संतान हे तेरी
भारत मा तू प्राण हमारी I

बेटा यह कहानी तो सुन
तू अपनी, दिल की सुन
तेरा यहाँ, कैसा शासन ,
खुली शोषण , फिर भाषण,
फिर कुर्सी या कैसा चयन,
लाढ़े सब,बड़े दुशासन I

बट-गयी तो कभी लूट गई,
बज़ार में बोली लग गयी,
नयी सरकार, वोही सरकार,
ना-उमीद की आदत, अब भी लग गयी I

और फिर लूट गई,
गणतंत्र की रिवाज़ से,
यह इलेक्शन की रीत से,
मेरी बच्चो की शासन से I

राजनीति का, देख रिवाज ,
सबकी आवाज़ , इनकी ताज़,
सतर शाल लगभग अब हुई ,
ज़्यादा या कम कभी चुप रोई I

दो वोट और लो नोट की नारा,
स्वीकार तुच्छ भीक की धारा,
कभी कौरव बने गौरव,
सोरेन-राजा की बने परब I

बेटा, मुझे तू आज़ाद कर,
पार्टी मंत्र , राजतंत्र  से,
यह राजनीति और लेख-नीति से,
कीमत लगी, इस बाज़ार से I

सिंघम बन,तू कर पुकार,
चुनाव  लड़ तू हो आगबर,
खुशाली भारत हो साकार,
अपना देश अपना सरकार I


रचना: प्रशांत

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