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Monday, 27 April 2015

फ्रेंडशिप की खोज !







आज निकल पडे टेलिफोन लगाए,
कुछ  अतीत के खोज मे,
कुछ दोस्ती कुछ शौक अंजाने ,
यारोंसे मिलने और यारी निभाने I

अफ़सोस था मन मे की,
यह कदम पहले क्यूँ ना उठे,
एक कदमकी दूरी पार ना सके,
जब जंजीर से बँधे हम ना थे I

आज हमे  जवां होना था,
जवानी के मेले मे घुलना था ,
यारोंसे कुछ तो थी सिकायत ,
इस को भूल फिर मिल ना था I

भुबनेश्वर शहर लगे अजनबी,
जब यादों से बिछुड़े इनकी छबि,
ज़िंदा हे यतीम या धन बेसाहारा,
जब यारी गवाई, ये पल ना आई I

रसा, रंजीत, कुल और सत्यजीत
डीडी, प्रशांत फिर जुड़े जो अतीत
ईरादे नेक तो पल बने अलबेला
उमर की अँकेड़े को पीछे धकेले I
 
रचना: प्रशांत



2 comments:

  1. भुबनेश्वर शहर लगे अजनबी,
    जब यादों से बिछुड़े इनकी छबि,
    ज़िंदा हे यतीम या धन बेसाहारा,
    जब यारी गवाई, ये पल ना आई I

    रसा, रंजीत, कुल और सत्यजीत
    डीडी, प्रशांत फिर जुड़े जो अतीत
    ईरादे नेक तो पल बने अलबेला
    उमर की अँकेड़े को पीछे धकेले I
    बहुत सटीक और रोचक

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  2. धन्यवाद योगी सारस्वत जी !

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