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Tuesday, 28 April 2015

कोई क्या सोचे, यह क्यूँ हम सोचें...

कोई क्या सोचे, यह क्यूँ हम सोचें,
कोई गुनाह जब हमे ना दिखे,
किसी के ठेस, क्यूँ हमे सताए
क्यूँ अफ़सोस  बार बार जताए I

कितनी  सदियाँ यूं बीत जाए,
दुनियादारी से खुद खो जाए,
मंज़ील आ पहुँचे, कोई ना आए,
फरियाद फिर खाली खाली रह जाए I

रचना: प्रशांत

1 comment:

  1. कितनी सदियाँ यूं बीत जाए,
    दुनियादारी से खुद खो जाए,
    मंज़ील आ पहुँचे, कोई ना आए,
    फरियाद फिर खाली खाली रह जाए I
    सुन्दर भावोक्ति प्रशांत जी

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