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Saturday, 18 April 2015

तू ज़रा मुस्कुरा दे !


ये आपनापन आप से ही मिले,
जो दौड़ आए किनारा छोड़ कर,
इस मे भी इतनी मिठास थी,
जो जिंदगी की प्यास बढ़ाए,
यह भी हमने सीखा,
सब अपने हैं जो जब मिले,
बस मिलने की प्यास खुद मे हो,
एक बार जो मुस्कुरा के हाथ बढ़ाए,
सितारे साथ साथ चलें, 
और तक़दीर मुस्कुरा के यह कहे,
ज़न्नत हर मोड़ पे है, 
जो तेरी इंतज़ार मे,
तेरा इंतेहा लेती है, 
बस तू मुस्कुरा दे,
ज़रा और मुस्कुरा दे I 

रचना: प्रशांत 

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