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Friday, 24 April 2015

कभी तुझसे ऐ यार, मिल ना सके...


कभी तुझसे ऐ यार, मिल ना सके,
तुझे ढूंढा हर डगर हर नगर पर पा ना सके I
ना बुझ पाई वो प्यास, जिसे थी तेरी आस,
न भेजा हमने वो खत जिसमे था तेरा एहसास I
क्यूंकि खतों की दरकार एक अदद पता होती है I
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खुद को नाम देने से परे, सूरज खामोश ढले,
हर घड़ी तूफान से घिरे, तोहफ़ा क़बूल ये ना बोले I
मेरे हमदम क्यूँ हर अशिक जीए और मरे,  
ज़िंदा हो इश्क़ , लेकिन इज़हार से डरे I

रचना: प्रशांत

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