Follow by Email

Thursday, 26 November 2015

यह ख्वाइश आज भी है ज़िंदा...




यह ख्वाइश आज भी है ज़िंदा,
नज़रों से दूर मैं जियूं ज़िंदा, 
ना कोई रोए, ना शोक मनाये, 
सुकून की नींद बस आ जाए, अगर ,
दुनिया था अशिक़, सुनने मे आए I

रचना : प्रशांत 

1 comment:

  1. ​​​​​​​​​सुन्दर रचना ..........बधाई |
    ​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​​आप सभी का स्वागत है मेरे इस #ब्लॉग #हिन्दी #कविता #मंच के नये #पोस्ट #असहिष्णुता पर​ ​| ब्लॉग पर आये और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें |

    ​http://hindikavita​​manch.bl​​ogspot.in/2015/11/intolerance-vs-tolerance.html​​
    http://kahaniyadilse.blogspot.in/2015/11/blog-post_24.html

    ReplyDelete