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Tuesday, 3 November 2015

एक परदा खामोशी की ओढ़...




चित्र साभार: http://www.springbokhouston.com/events/2014/12/31/new-years-eve-masquerade

एक परदा खामोशी की ओढ़, 
क्यूं चले आते हो बेपर्दा, 
सिसकियाँ  सुन लेता है जमाना, 
आज भी वो दीवानो की दीवाना I 

जग ढूंढे तुम्हे यहाँ वहाँ, 
जाने कहाँ कहाँ  जहाँ तहाँ, 
मुझे जीने दे अंजान, घने बादल मे ,
हमआरज़ू के बाहों मे I 
रिश्ते ना कर तू ज़िंदा,  
तस्वीर की तक़दीर खोज मे I 

रचना : प्रशांत 

1 comment:

  1. जग ढूंढे तुम्हे यहाँ वहाँ,
    जाने कहाँ कहाँ जहाँ तहाँ,
    मुझे जीने दे अंजान, घने बादल मे ,
    हमआरज़ू के बाहों मे I
    रिश्ते ना कर तू ज़िंदा,
    तस्वीर की तक़दीर खोज मे I
    ​स्वागत ! सुन्दर शब्दों का

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