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Wednesday, 7 October 2015

पल बीत जाए तो ये पल ना आए




पल बीत जाए तो ये  पल ना आए,
इस बात का गम रहेगा यारो,
यह पल भी यू हीं बीत जाएगी,
रात बंजर, बात उदास जाएगी I

और फिर एक बार चाहत कर जीने की
चलने की ,गिरने की, सँभालने की I

अपने सोच को उसके सच पे छोड़,
क्या होगा कल ये वक़्त की तराज़ू पे छोड़,
अपनों को अपना बना,खिज़ा में भी गुल खिला,
कल क्या होगा ये कल पे छोड़ ,

आज को देता चल हर पल एक नया मोड़ I

रचना: प्रशांत 

5 comments:

  1. अपने सोच को उसके सच पे छोड़,
    क्या होगा कल ये वक़्त की तराज़ू पे छोड़,
    अपनों को अपना बना,खिज़ा में भी गुल खिला,
    कल क्या होगा ये कल पे छोड़ ,

    आज को देता चल हर पल एक नया मोड़ I


    ​बहुत सुन्दर प्रशांत जी !!

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    1. धन्यवाद योगी सारस्वत जी!

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  2. आज को देता चल हर पल एक नया मोड़

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    Replies
    1. धन्यवाद राकेश जी!

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  3. This comment has been removed by the author.

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