Thursday, 19 February 2015

क्यूँ ना एक बार फिर...

क्यूँ ना एक बार फिर ,
प्यार  मिले  मुड़ के ,
हम तो प्यासे हैं,
तर हो जाएंगे, एक बार फिर जुड़ के I

एक सुबह ऐसी हो फिर से ,
जो लगे थोड़ी अलग ,
खुशबु  बिखरे फूलो से ,
मन जाए सुलग,फिर से I

क्यूँ ना एक दिन आए फिर से,
जो किये रहे हमें दिन भर बेचैन,
हर पल बस हम देखें शाम की हीं राह ,
जब हो दीदार उसका तभी मिले हमें चैन I

क्यूँ ना एक शाम आए फिर से ,
जब हम साथ साथ चलें मिल के,
हो हाथों में हाथ उसका
लब रहें खामोश पर दिल बातें करे खुल के I

क्यों न एक रात आये फिर से,
जो सजाये तड़प की बारात फिर से,
पर रखे जो रात के जतन को अपने ही अंदर,
जैसे सीपी सोती हैं गहन समंदर  I

रचना: प्रशांत 

Monday, 16 February 2015

अगर शराब शराबी बन जाए...

अगर शराब शराबी बन जाए,
कितनी आफ़त को वो दावत दे आए,
होश संभाले तो संभाले कैसे ,
खुमारी खुद उसकी मियादी बन जाये I  

ना प्याले पे वो उतर सके,
ना मधुशाला की पंक्ति बने,
ना दीवानो का होशों की बारात बन सके,
ना होठ ना नज़र को चैन मिल सके,
अगर शराब खुद शराबी बन जाये I

रचना: प्रशांत 

डर के रिश्ते!

डर के रिश्ते!

जब रहे ना प्यार अपने करम के धरम से ,
कुछ ना मिले मुझे डर डर के जीने से,
क्यू ए प्यार चाहे, अपने अपनो से रहे,
जब तक़दीर हमारा  लिखा  बदल ना पाए,
प्यार और डर यू हीं , साथ साथ जागे,
रिशतों  को नाम देने से, डर और लगे,
रिश्ते  जो अब रंग देने से रहे ,
उसे मुँह मोड़ देना आप भी चाहे I

ना समझ प्यार, हर लगाव को तुम,
कहीं  तुम से ये डर, ना करे प्यार गुम,
रिश्ते उलझन ना हो, यह डर सोते हुए भी  जागे,
कही रिश्ता, रिश्ता हीं न  रहे इसका डर और लगे I


रचना : प्रशांत

Friday, 13 February 2015

क्यूँ किसी को ऐतराज़ हो...

क्यूँ किसी को ऐतराज़ हो,
ग़र  तुझे भले ज़ख़्मो हीं से प्यार हो ,
तेरे ज़ख्मों पे तू फिदा हो,
अगर तेरे आँसू से सिंची ,
तेरे कहानी फिर से  जिंदा हो ,
तो क्यूँ किसी को ऐतराज़ हो ? 
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कभी अलग मिलकर तू देख ,
कटी पतंग के डोर छू कर तू देख ,
टूटे शीशे को जोड़कर  तू देख, 
कभी किनारो से दूर डूब कर तू देख,
जो दिखे उसे महसूस कर तू देख I 
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हज़ार चेहेरे तेरे और दिखे ,
ख्वाबो मे जो ना दिखे ,
नज़र मिलाए तुझे दिखे ,
क्या महबूब की चहेरे से 
नक़ाब उठ ना पाए ,
या कोई चेहरा 
तु आज देख ना पाए I 

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रचना : प्रशांत 

Thursday, 12 February 2015

ऐसा क्यूँ है की...

ऐसा क्यूँ है की तुझे चाह कर भी 
तेरा ना हो सका,
तेरी ख्वाइशों की  बंदिश से आज़ाद, 
मेरा दिल हो ना सका I 

यह जिना भी कोई जीना है , 
जब खुद तू ही मुझसे दूर है,
इतनी दूर की ख्यालों में भी , 
आज किसी और का  दखल है I 

हाँ जब दूसरे  कर दिए,
तब फिर  तेरी याद आई,
शरण मे आए फिर भी, 
तमन्ना  बदल ना पाई I

रचना : प्रशांत 

Sunday, 8 February 2015

लंबी खामोशियाँ...

लंबी खामोशियाँ ,
कभी मुझसे ये मुझे जोड़ दे, 
और कभी मुझे 
मेरे दुनिया से अलग कर दे I 

ठिकाना याद ना हो,
पर खत यादो मे भरी हो ,
यह ज़रूरी तो नही ,
इसका भी हिसाब हो I 

रचना: प्रशांत 

Tuesday, 3 February 2015

जिंदगी तू क्यूँ नज़र आए...

जिंदगी तू क्यूँ नज़र आए, 
जब मेरे जाने की बारी हो, 
कुछ पल की मेहमान से, 
क्यूँ हिसाब लेने के ज़िद हो I 

जब शरीर बोझ लगे, और
आत्मा सोच से हो परे, 
कुछ्पल अगर ऐसे जिंदा हैं, 
क्यूँ हिसाब लेने के ज़िद हो I

रचना : प्रशांत